सोमवार, 1 सितंबर 2014

टटोलती आँखे

पूरा दिन उमस से भरा हुआ.
शाम भी जाने रुक रुक कर सांस ले रही थी,
शायद घुटन सी थी आज कुछ.
पर रात जाने पूरब की और से कुछ सौगात ले आई
धीरे धीरे सारा आलम बदलने लगा
दबी दबी सी चलने वाली हवाओ ने अपने पंख फैला लिए थे
बादलों ने भी बुलावा सुन लिया
बिजली की कड़कड़ाहट ने बरामदे में कड़ी गुड़िया को डरा ही दिया, फट से उसने आँखों के
सामने अपने हाथो को रख दिया और बस उंगलियों के परदे से वो झांकती रही
कई दिनों से आसमान टटोलती इन आँखों ने देखा वो बरसता पानी, बरसता पानी .....
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