सोमवार, 11 जुलाई 2016

नज़्म

नज़्म कुछ नाराज़ है मुज़से,
कुछ पूंछू, क्यों नाराज़ हो मुझसे ?
वो बस आँखे दिखा कर, बोलती कुछ नहीं
में समज़ जाता हु की क्या शिकायत है उसकी
पर बस कुछ दुश्वारियां है की अल्फ़ाज़ अब उतरते नहीं कागज़ों पर !!

शनिवार, 11 जून 2016

अल्फ़ाज़


सामने हो पर फासले कुछ खाई से नज़र आते है,
अल्फ़ाज़ आते है दिमाग से पर ज़बान पर आने से सुख जाते है सारे ।
हाँ दरारें है कुछ उस सुखी मिट्टी की तरह् जो
कुछ बुँदे पानी की गिरने से भर जाती ह,
चले दो कदम साथ फिरसे ? शायद कुछ पानी बरस जाए और मिट्टी भीग जाए --
चिरायु