मंगलवार, 2 जुलाई 2013

Mazaar....

एक आँख  मसलती सुबह का मंज़र था, नकाब कोश कोई करीब आ रहा था
ठीक से देख नहीं पाया उसे शायद गहरी नींद सो रहा था या कोहरे की बदोलत नज़र धुन्दला कर गई थी
पर जब नज़रे साफ़ हुई तो मजार पर कुछ फूल बिखरे पड़े थे और कोई अपने अश्क भी छोड़ गया थ…

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