शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

एक जूमला

सुबह की चाय से शुरू होती है सियासत
अख़बार की काली सियाही से घर तक आती है सियासत
भीड़ में भी चलती है सियासत
कही सन्नाटो में भी गूंजती है सियासत
बेहिसाब जुमलो में चिल्लाती है सियासात
किसीको कंधे पर उठाने में भी है सियासत,
किसी को पटकने भी काम आती है सियासत
बड़े बड़े मंच से सियासतदानों बांटी है मुफ्त में 
कही रोटी कही बिजली,
पर मेरे मुह को तो पानी भी नसीब नहीं
बस बाजारों में ऐसे ही बिक रही है सियासत ..


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